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आतंकवाद से निपटने को बातचीत जरूरी : दलाई लामा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Wed, 06 Mar 2019 01:07 AM IST
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दलाई लामा
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60 साल से तिब्बत से दूर शरणार्थी के रूप में भारत में रहकर दुनिया को शांति का पैगाम देने वाले बौद्ध धर्मगुरु 14वें दलाई लामा का मानना है कि बातचीत से ही आतंकवाद से निपटा जा सकता है। दलाई लामा ने मैकलोडगंज स्थित अपने निवास पर ‘अमर उजाला’ के संवाददाता सुनील चड्ढा से कई अहम मसलों पर एक घंटा 40 मिनट तक बातचीत की। मुख्य अंश
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पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान में तनाव बढ़ा... पूरी दुनिया के लिए बड़ी समस्या बन चुके आतंकवाद को खत्म करने के लिए आपका क्या संदेश है?

कट्टरपंथी मंगल ग्रह पर भेज दिए जाएं, यह तो हो नहीं सकता। इस धरती पर सबको मिलकर रहना है। इसलिए बातचीत ही आतंकवाद से निपटने का बेहतर तरीका है। हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भी बातचीत के जरिये शांति का मार्ग अपनाने की बात कही। अमेरिका भी अफगानिस्तान सहित कई क्षेत्रों में कट्टरपंथियों को खत्म नहीं कर सका। आतंकी भी बचपन में सामान्य नागरिक होते हैं। जब उन्हें गलत शिक्षा देकर भेदभाव का पाठ पढ़ाया जाता है तभी वे भटकते हैं। इस सदी को ‘डायलॉग ऑफ सेंचुरी’ का नाम दिया जाना चाहिए।

दलाई लामा पदवी स्थापित रहेगी या नहीं? अगले दलाई लामा कब चुने जाएंगे और वह कौन होंगे?
अगला दलाई लामा होगा या नहीं, यह तिब्बत की जनता को तय करना है। दलाई लामा पदवी के भविष्य को लेकर इस साल विचार-विमर्श किया जाएगा। इसके लिए निर्वासित तिब्बत सरकार और उच्च लामाओं की टीमें इस वर्ष बैठकें करेंगी। मुझे लगता है कि वे दलाई लामा संस्थान को आगे बढ़ाने का निर्णय लेंगे, लेकिन यह मेरा विषय नहीं है। बौद्ध भिक्षु होने के नाते मेरी रोजमर्रा की जिंदगी लोगों के लिए समर्पित होनी चाहिए। 

निर्वासन के 60 बरस बीत गए... क्या कभी तिब्बत वापस जा पाएंगे?
मैं तिब्बत जाने को उत्सुक हूं। वहां एक या दो हफ्ते रहना चाहता हूं। चीन के लाखों लोग बौद्ध धर्म अपना चुके हैं। जब भी वे मेरे पास आते है, उन्हें उपदेश देता हूं। भारत का पुरातन ज्ञान चीन में भी फैलाना चाहता हूं, लेकिन चीन में वही सिस्टम है जो मेरे वहां रहते था। चीन में आज भी हालात नाजुक हैं।

तिब्बत मसले पर चीन सरकार से वर्तमान में कोई बातचीत?
साल 2002 के बाद चीन सरकार से कोई औपचारिक वार्ता नहीं हुई। अनौपचारिक तौर पर वहां के कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी और व्यापारी मुझसे मिलने आते रहते हैं। जब से मैंने तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग त्यागी है, तब से चीन के नेता चाह रहे हैं कि दलाई लामा को वापस लाया जाए।

अगर आपको भारत नहीं आना पड़ता और तिब्बत में ही रहते तो क्या बदलाव पाते?
भारत में आकर मुझे कई बुद्धिजीवियों से मिलने का मौका मिला। मैं खुश हूं कि मैं आज भारत में हूं। अगर आज भी मैं लहासा में होता तो रूढ़िवादी लामा होता। मुझे लगता है कि 14वां दलाई लामा बहुत मॉडर्न है।

‘10 वर्ष और जीऊंगा, भारत में आखिरी सांस लेने की इच्छा’
दलाई लामा ने कहा कि दुनिया में 7 अरब लोगों की सलामती, धार्मिक सद्भाव बढ़ाना, तिब्बत का पर्यावरण और संस्कृति बचाना, दुनिया में करुणा और अहिंसा फैलाना मेरी प्रतिबद्धताएं हैं। भारत में ही आखिरी सांस लेना मेरी इच्छा है। 10 साल और जीऊंगा। कोशिश करूंगा कि पुरातन शिक्षा पद्धति को दुनिया में प्रसारित किया जा सके।

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