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गृह मंत्रालय की ये बातें मान ली होती तो आज जिंदा होतीं उन्नाव और हैदराबाद की बेटियां

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 07 Dec 2019 08:20 PM IST
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गृह मंत्रालय
गृह मंत्रालय - फोटो : फाइल
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हैदराबाद की बेटी का केस हो या उन्नाव की बेटी का, दोनों ही मामलों में लोगों का गुस्सा उबाल खा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय, महिला सुरक्षा के लिए गत वर्षों में दर्जनों एडवाइजरी जारी कर चुका है। अगर समय रहते सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश गृह मंत्रालय की सलाह मान लेते तो उन्नाव और हैदराबाद की बेटियां आज जिंदा होती। गृह मंत्रालय ने इस साल भी आधा दर्जन एडवाइजरी भेजकर मुहिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही थी।
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मंत्रालय ने अपनी सलाह में उन सभी उपायों का भी जिक्र किया था, जिनकी मदद से महिलाओं के साथ होने वाले जघन्य अपराधों को रोका जा सके। प्रमुख बातों में 'गुड समारिटन' और 'जीरो एफआईआर' करना शामिल था। केंद्रीय गृह मंत्रालय की दर्जनभर सिफारिशों को लागू करने में अधिकांश राज्यों ने अनावश्यक देरी की है।

2015 में जारी की गई थी एडवाइजरी

गृह मंत्रालय के सेंटर-स्टेट डिविजन ने 12 मई 2015 को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों को महिला सुरक्षा के मुद्दे पर एक एडवाइजरी जारी की थी, जिसमें दर्जनभर सिफारिशों का जिक्र था। जैसे, 'गुड समारिटन' या शिकायतकर्ता को किसी भी तरह से परेशानी न होने देना और सूचना मिलते ही अविलंब जीरो एफआईआर करना, पुलिस बल में महिलाओं की संख्या बढ़ाना, अपराध की संभावना वाले इलाकों में बीट कांस्टेबल की तैनाती, पुलिस हेल्प बूथ, रात के समय पेट्रोलिंग बढ़ाना, मोबाइल पुलिस वैन में महिलाओं की संख्या में वृद्धि, महिलाकर्मी जिस रास्ते से अपने घर या दफ्तर जाती हैं वहां पुलिस गश्त में बढ़ोतरी और खासतौर पर रात के समय उस रूट को पूरी तरह सुरक्षित बनाने जैसी कई बातें मंत्रालय की सिफारिशों में शामिल रही हैं।

क्या है गुड समारिटन?

सड़क हादसों के मामले में लोग 'गुड समारिटन' को अब थोड़ा बहुत जानने लगे हैं। उन्हें पता है कि सड़क हादसे में घायल व्यक्ति की मदद करना, जैसे उन्हें अस्पताल पहुंचाना, पुलिस को सूचित करना या अन्य किसी तरीके से मदद पहुंचाना, ये सब कार्य गुड समारिटन के तहत आते हैं। ऐसे मामलों में मदद करने वाले व्यक्ति से पुलिस पूछताछ नहीं करेगी। संबंधित व्यक्ति चाहे तो अपना नाम व पता भी छिपा सकता है। किसी भी तरह की कार्रवाई के लिए उसे थाने नहीं बुलाया जाएगा।
आज हालत यह है कि अपराधिक वारदात के दौरान अधिकांश लोग मदद के लिए आगे नहीं आते। वे सोचते हैं कि बाद में पुलिस उन्हें पूछताछ के नाम पर परेशान करेगी। इस बाबत राज्यों ने न तो पुलिस और न ही लोगों को जागरूक किया।

जेंडर सेंसिटीविटी पर हों ट्रेनिंग प्रोग्राम

मंत्रालय ने अपनी सिफारिशों में कहा था कि जेंडर सेंसिटीविटी को लेकर गहराई से काम किया जाए, लेकिन अधिकांश राज्यों ने इसे हल्के में लिया है। कुछ मेट्रो सिटीज को छोड़कर बाकी जगहों पर इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ। यह कहा गया था कि एक नियमित अंतराल पर पुलिसकर्मियों के लिए जेंडर सेंसिटीविटी ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरु किए जाएं। उनकी वार्षिक परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट में इस बात के अंक दिए जाएं कि फलां पुलिस कर्मी ने जेंडर सेंसिटीविटी के लिए ये अच्छा काम किया है।

पोस्टिंग और प्रमोशन में भी इस बात का ध्यान रखा जाए। थाने व चौकियों की जब निरीक्षण हो, तो जेंडर सेंसिटीविटी को उसमें शामिल करने के लिए कहा गया था। मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि इस दिशा में किसी भी राज्य ने सराहनीय काम नहीं किया है। दिल्ली जैसे मेट्रो सिटी में इसे लेकर काफी कुछ काम हुआ है।

जीरो एफआईआर को लेकर राज्य सचेत नहीं 

गृह मंत्रालय ने इस साल 16 मई और पांच दिसंबर को भी एक एडवाइजरी जारी की थी। जिसमें महिलाओं के मामले में जीरो एफआईआर और कानूनी पहलुओं को मजबूती प्रदान करने की बात कही गई थी। युवतियों की सुरक्षा के लिए विशेष दिशा निर्देश जारी हुए थे। पुलिस प्रोएक्टिव होकर काम करे और गंभीर यौन अपराधों के मामलों में कैसे कार्रवाई हो, इस बाबत विस्तृत तरीके से बताया गया था। इन्वेस्टिगेशन ट्रेकिंग सिस्टम फॉर सेक्सुअल ऑफेंडर (आईटीएसएसओ) को लेकर जारी एडवाइजरी पर भी खास काम नहीं हुआ।

इस सिस्टम को सीसीटीएनएस के साथ जोड़ा जाना था। जीरो एफआईआर के विषय में पुलिसकर्मियों को खूब समझाया गया, लेकिन आज भी ज्यादातर राज्य इस बारे में रूचि नहीं ले रहे हैं और गंभीर यौन अपराधों में भी पीड़िताओं को थानों की सीमा के चलते में इधर-उधर धक्के खाने पड़ते हैं।

नहीं तैयार हो पाईं मॉडर्न फोरेंसिक लैब

सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 10 सितंबर 2019 को यह एडवाइजरी जारी की गई कि वे यौन अपराधों से जुड़े मामलों की जांच के लिए अपने यहां पर मॉडर्न फोरेंसिक लैब बनाएं। ऐसा करने से मामलों की जांच में तेजी आएगी। अदालत के समक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस तथ्य रखने में मदद मिलेगी। गृह मंत्रालय ने इसके लिए जरूरी ट्रेनिंग और टूल का भी जिक्र किया था।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फोरेंसिक साइंस और बीपीआरएंडडी के जरिए ट्रेनिंग का शेड्यूल तय करने की बात कही गई। बीपीआरएंडडी के एक अधिकारी का कहना है कि देशभर में सात लाख सेक्सुअल ऑफेंडर्स का डाटाबेस तैयार किया गया है।

इसे सभी राज्यों को हर थाने और चौकी तक पहुंचाना था। इसके लिए सीसीटीएनएस की मदद लेने की बात कही गई, लेकिन अभी तक ज्यादातर राज्य इस दिशा में कुछ खास नहीं कर सके। 10 सितंबर 2019 को यौन अपराधों की जांच के लिए फोरेंसिक लैब गठित करने की खातिर बजट जारी किया गया। फोरेंसिक लैब के लिए 105.90 करोड़ रुपये और 131.09 करोड़ रुपये डीएनए एनालिस्ट यूनिट स्थापित करने के लिए दिए गए।साइबर फोरेंसिक यूनिट के लिए अलग से 93.76 करोड़ रुपये का बजट दिया गया।

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ये थी सिफारिशें

इमरजेंसी रेस्पॉन्स स्पोर्ट सिस्टम को त्वरित गति से शुरू किया जाए। सेक्शन 326ए, 326बी, 354, 354बी, 370, 370ए, 376ए, 376बी, 376सी, 376डी, 376ई और सेक्शन 509 के तहत मामला दर्ज करने में कोई देरी न हो। कोई अधिकारी मामला दर्ज नहीं करता या देरी करता है, तो उसके खिलाफ अपराधिक दर्ज किया जाए। इस केस में छह माह से लेकर दो वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। यौन अपराधियों का डाटा बेस तैयार हो, उसे सीसीटीएनएस से जोड़ा जाए।
 
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