अगर लद्दाख में नहीं माना चीन तो दक्षिण चीन सागर तक हर जगह खुलेगा मोर्चा

शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 04 Sep 2020 01:20 PM IST
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डीबीओ के पास का इलाका - फोटो : Amar Ujala (File Photo)

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सार

  • भारत ने की चीन से सख्त अपील, सीमा पर शांति और सौहार्द बनाए, फौज वापस बुलाए
  • वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का एक तरफा बदलाव का प्रयास ठीक नहीं
  • नहीं माना पड़ोसी देश तो भारत अपनी जमीन की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध

विस्तार

भारत और चीन के द्विपक्षीय रिश्तों में फिलहाल हर रोज तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। सैन्य कमांडर स्तर की चौथे दिन तक की लगातार वार्ता के कोई ठोस नतीजे अभी तक नहीं निकले हैं। इस बीच भारत ने बड़ी सख्ती के साथ चीन से सीमा पर शांति और सौहार्द कायम करने की अपील की है।
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विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा है कि चीन को द्विपक्षीय रिश्ते, प्रोटोकॉल और विशेष प्रतिनिधि (एनएसए अजित डोभाल और स्टेट काउंसलर वांग यी) के बीच पांच जुलाई को बनी सहमति के आधार पर अपने सैनिकों की पूर्ण वापसी सुनिचित करनी चाहिए।


विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस बयान में भारत के धैर्य की भी झलक दिखाई दे रही है। गौरतलब है कि लद्दाख क्षेत्र में चीन के फौजियों की घुसपैठ को लेकर दोनों देशों के सैनिकों में पहली झड़प पांच मई को हुई थी। दूसरी झड़प 15 जून को हुई और इसमें भारत के 20 से अधिक जवान शहीद हुए। जबकि चीन ने झड़प के दौरान हुए नुकसान पर पर्दा डाल रखा है। इसके बाद से दोनों देशों का सीमा प्रबंधन से जुड़ा वर्किंग प्रबंधन समूह सक्रिय है।

सैन्य कमांडर स्तर पर भी दोनों देश कुछ दर्जन बार वार्ता कर चुके हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने समकक्ष वांग यी से 15 जून की घटना के बाद बात की और इसके बाद 5 जुलाई को दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों (डोभाल और वांग यी) के बीच में चर्चा हुई। इसमें गलवान घाटी में बफर जोन बनाने तथा चीन द्वारा भारतीय भू-भाग से अपने सैनिकों की वापसी पर सहमति बनी।

दोनों देशों के बीच में एक दूसरे को अपने यहां व्यवसाय, कारोबार, विकास के समान अवसर उपलब्ध कराने पर भी सहमति बनी, लेकिन इसका मुख्य आधार चीन सैनिकों की भारतीय भू-भाग से वास्तविक नियंत्रण पर चीन की तरफ पूर्ण वापसी ही थी। भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना है कि चीन अपना यह वादा नहीं निभा रहा है।
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