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सेना में बेटियों को मिले स्थायी कमीशन: ट्वीट पर घिरे राहुल गांधी, स्मृति ने कहा अब्दुल्ला दीवाने

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 18 Feb 2020 12:21 PM IST
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स्मृति ईरानी और राहुल गांधी
स्मृति ईरानी और राहुल गांधी - फोटो : amar ujala
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सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार को घेरने की कोशिश की लेकिन वह खुद ही घिर गए। राहुल गांधी के ट्वीट पर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने पलटवार करते हुए उन्हें अब्दुल्ला दीवाने नाम दे दिया। 
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स्मृति इरानी ने लिखा, 'आदरणीय बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाने। वह पीएम नरेंद्र मोदी ही थे जिन्होंने सेना में महिलाओं के स्थायी कमिशन की बात कही थी। जिससे लैंगिक न्याय सुनिश्चित किया गया। आपकी सरकार में जब इस मुद्दे को भाजपा की महिला मोर्चा ने उठाया था। ट्वीट करने से पहले टीम को बोलो चेक करे।'

इससे पहले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सेना में सभी महिलाओं को स्थायी कमिशन देने का आदेश दिया। इसपर राहुल गांधी ट्वीट किया था, 'सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी कि महिला आर्मी अफसर कमांड पोस्ट या स्थायी सर्विस के योग्य नहीं हैं क्योंकि वे पुरुषों से कमतर हैं। ऐसा करके सरकार ने सभी भारतीय महिलाओं का अपमान किया है। मैं भारत की महिलाओं को आवाज उठाने और भाजपा सरकार को गलत साबित करने के लिए बधाई देता हूं।'

बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2010 में ही भारतीय सेना की महिलाओं को स्थाई कमीशन देने के निर्देश दिया था, लेकिन तत्कालीन यूपीए सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई थी। 

अपने ही बयान पर घिरे राहुल गांधी

राहुल गांधी के इस बयान के बाद महिला सैन्य अधिकारियों का केस लड़ने वाली वकील और भाजपा नेता मीनाक्षी लेखी और हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील नवदीप सिंह ने राहुल गांधी को याद दिलाया कि कोर्ट के फैसले के खिलाफ तत्कालीन यूपीए सरकार कोर्ट में गई थी, ना कि भाजपा। 

मीनाक्षी लेखी बोलीं- मेमोरी बटन को रिफ्रेश करें

भाजपा नेता मीनाक्षी लेखी ने राहुल पर तंज कसते हुए कहा कि कृप्या, राहुल गांधी अपने मेमोरी बटन को रिफ्रेश करें। यह कांग्रेस सरकार थी जिसने दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष 2010 में सेना में महिलाओं के स्थायी कमीशन के खिलाफ विरोध किया था। 

नवदीप सिंह ने कहा कि महिला अधिकारियों को यह लाभ देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील 2010 में दायर किया गया था, जब वर्तमान सरकार सत्ता में नहीं थी। इसलिए, मेरा मानना है कि इस तरह के मुद्दों और न्यायिक फैसलों का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।
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