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99 पशुओं को उनके पैरों पर खड़ा कर चुका है यह डाक्टर, दिव्यांग जानवरों के लिए बना भगवान!

अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 03 Dec 2019 04:03 PM IST
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Divyang Cattle
Divyang Cattle - फोटो : AmarUjala
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सार

  • पशुओं को कृत्रिम अंग लगाकर चलाने की अनूठी पहल
  • 100वें पशु को पैर देने जा रहे डॉक्टर तपेश
  • कई संगठनों से इस अनूठे काम के लिए मिल चुका है पुरस्कार

विस्तार

दिव्यांगता मनुष्य के जीवन में संघर्ष बढ़ा देती है। लेकिन उचित ट्रेनिंग, मजबूत इरादे और परिवार के सदस्यों के सहयोग से लोग इसके ऊपर विजय हासिल कर लेते हैं। लेकिन सोचिये कि अगर यही दिव्यांगता पशुओं के जीवन में आ जाये तो उन पर क्या बीतती होगी? ऐसे पशुओं को कोई अपनाना भी नहीं चाहता। उपयोगी न रह जाने के बाद इन पशुओं के सामने धीरे-धीरे मौत की तरफ बढ़ने के आलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता। लेकिन हमारे समाज में ऐसे लोग भी हैं जो न सिर्फ इन बेजुबानों का दर्द समझते हैं, बल्कि उनका कष्ट कम करने के लिए दिन-रात प्रयास भी कर रहे हैं।
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जयपुर की हिंगोनिया गोशाला के पशु चिकित्सक डॉक्टर तपेश माथुर दिव्यांग पशुओं को कृत्रिम अंग लगाकर उन्हें जीवन देने में लगे हुए हैं। वे इसी हफ्ते जयपुर की चंचल नाम की एक बछिया को पैर लगाने जा रहे हैं, जो उनका सौवां केस होगा। संभवतः पशुओं को कृत्रिम अंग लगाने का देश भर में उनका यह इकलौता प्रयास है। किसी भी राज्य या केंद्र सरकार के स्तर पर इस तरह की कोई योजना भी नहीं चलाई जा रही है। इस अर्थ में यह अपने आप में एक अनूठा प्रयास कहा जा सकता है। 
 
डॉक्टर तपेश माथुर ने अमर उजाला को बताया कि दो साल की बछिया चंचल को एक सड़क दुर्घटना के दौरान गहरी चोट लग गई थी। इलाज के दौरान उसका एक पैर काटना पड़ा था। इसके बाद से उसका जीवन काफी कष्टमय हो गया। लेकिन उससे बेहद लगाव रखने वाले उसके मालिक उसे अपने पैरों पर खड़े होते हुए देखना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि वे चंचल के अंगों की साइज़ ले चुके हैं और इसी हफ्ते चंचल अपने कृत्रिम पैर पर चलने के काबिल हो जायेगी।

इस तरह हुई शुरुआत

डॉक्टर तपेश माथुर वर्ष 2012 में एक पशु चिकित्सक के रूप में राजस्थान की सरकारी गोशाला में स्थानांतरित होकर आये थे। अन्य अस्पतालों में लोग पशुओं का इलाज उनसे करवाते थे, लेकिन इलाज के बाद उन्हें अपने साथ लेकर चले जाते थे। लेकिन हिंगोनिया गोशाला में रहकर काम करते हुए उन्होंने इलाज के बाद भी पशुओं के संघर्ष को अपनी आंखों से देखा। यहीं पर उन्हें पशुओं को उनके दर्द से मुक्ति देने का विचार आया। इसके बाद उन्होंने गूगल से कृत्रिम अंग बनाने की कला सीखने की कोशिश की। इसमें उन्होंने अपने कई मित्रों का सहयोग भी लिया। 

सबसे पहले कृष्णा नाम के बछड़े को लगाया पैर

डॉक्टर तपेश माथुर के मुताबिक़ उन्हें स्वयं भी इस बात पर विश्वास नहीं था कि उनका यह प्रयोग कितना सफल होगा। इसलिए बिना किसी को बताये उन्होंने अपने मकान की छत पर पशुओं के कृत्रिम पैर बनाने की कोशिश शुरू की। सबसे पहले उन्होंने कृष्णा नाम के एक बछड़े को कृत्रिम पैर लगाया। उन्हें इसमें सफलता मिली और वह अपने पैरों पर चलने लगा। एक जगह पर बंधे रहने को मजबूर कृष्णा, कृत्रिम पैर लगने के बाद सामान्य बछड़ों की तरह इधर-उधर जाना, चरना और खेलना शुरू कर दिया। इससे उनका उत्साह बढ़ने लगा। उसके बाद ही उन्होंने इसकी जानकारी अन्य लोगों को दी। 
 
डॉक्टर माथुर के मुताबिक ऐसे पशुओं का सामान्य जीवन काल कम हो जाता है। कृष्णा भी कुछ समय के बाद इस दुनिया से चला गया, लेकिन उसके नाम पर ही उन्होंने ‘कृष्णा लिंब’ संगठन की नींव रखी। आज इसी के माध्यम से वे पूरे देश में घूम-घूमकर पशुओं को कृत्रिम अंग लगाते हैं।

सोशल मीडिया बना वरदान

सोशल मीडिया ने डॉक्टर तपेश माथुर की पहुंच काफी दूर-दूर तक पहुंचा दी है। उन्होंने 'कृष्णा लिंब' के नाम से फेसबुक पेज बना रखा है। इसके जरिये लोग लगातार उनसे संपर्क करते हैं। इसके अलावा सफल केस के बाद लोगों के बीच बातचीत भी लोगों को उनके पास तक पहुंचाती है। यहां तक कि लंदन और क्रोएशिया तक से लोग उनसे पशुओं को कृत्रिम पैर लगाने के तरीके सीख रहे हैं। उन्होंने बताया कि क्रोएशिया में एक केयरटेकर गैबरीला ने उनसे बछड़े को पैर लगाने के लिए संपर्क किया था। वे मेनका गांधी के संचालित संचालित संगठन संजय गांधी गोशाला के जरिये भी पशुओं की सेवा कर रहे हैं।


क्या है चैलेंज

सामान्य मनुष्य को भी कृत्रिम अंग लगाने के बाद उनसे सामंजस्य स्थापित करना एक बड़ा चैलेंज होता है। चूंकि सामान्यतया दिव्यांग लोग यह काम स्वयं कर लेते हैं, इसलिए लोगों में यह बड़ी समस्या नहीं बनता। लेकिन पशुओं के संदर्भ में यही बात एक समस्या बन जाती है। डॉक्टर तपेश माथुर ने बताया कि पशुओं के ये कृत्रिम अंग रोज सुबह लगाना पड़ता है और शाम को निकालना पड़ता है। इसके आलावा शुरुआत में पशुओं को इन अंगों के साथ चलने के लिए प्रशिक्षित भी करना पड़ता है। 
 
इसके अलावा व्यक्ति तो स्वयं डॉक्टर के पास पहुंच जाते हैं या उनके परिवार के लोग उन्हें डॉक्टर के पास पहुंचा देते हैं। लेकिन दिव्यांग पशुओं को कहीं ले जाना संभव नहीं होता। ऐसे में उन्हें स्वयं ही पशु के स्थान पर पहुंचना होता है। नौकरी की बाध्यताओं के चलते इसके लिए दूर-दराज क्षेत्रों में पहुंचना उनकी अतिरिक्त समस्या बन जाती है।

मजबूत पैर बनाना भी चुनौती

वह बताते हैं कि पशुओं का शरीर काफी भारी होता है। ऐसे में उनका भार सहन करने योग्य कृत्रिम अंग बनाना भी काफी चुनौती भरा काम होता है. उन्होंने बताया कि वे इसके लिए एसडीपी पाइप जैसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं। इसके आलावा अब वे पोलीप्रोपाइलिन पदार्थ का भी इस्तेमाल करते हैं। यह वजन में काफी हल्का, लेकिन काफी मजबूत होता है। पशुओं के वजन के हिसाब से यह दो मिमी से लेकर आठ मिमी तक की मोटाई का होता है।

यह लगभग 300 से 400 किलो का भार वहन करने में सक्षम होता है। छोटे पशुओं के कृत्रिम अंग लगाने के बाद उनके बड़े होने पर इसे बदलना भी पड़ता है। एक सामान्य कृत्रिम अंग लगाने में लगभग आठ हजार रुपये तक का खर्च आता है। 

मिला चुका है सम्मान

पशुओं को कृत्रिम पैर लगाने का उनका यह काम अनूठा था. इसके लिए उन्हें पशु चिकित्सा के क्षेत्र की सर्वोच्च संस्था ‘इंडियन सोसाइटी फॉर वेटेरिनरी सर्जरी’ ने 2014 में गोल्ड मेडल देकर सम्मानित किया गया। इसके आलावा चेन्नई में उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र पशुचिकित्सक’ के पुरस्कार से भी नवाजा गया। 
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