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कोरोना से लड़ने में क्या हुई देरी? पढ़े क्वारंटीन पर आईसीएमआर का नया शोध

Tanuja YadavTanuja Yadav Updated Wed, 25 Mar 2020 02:49 PM IST
सेना द्वारा बनाया गया विशेष वार्ड
सेना द्वारा बनाया गया विशेष वार्ड - फोटो : ANI
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कुछ दिनों पहले ही भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एक शोध पत्र जारी किया है। ये शोध बताता है कि कोरोना के 50 फीसदी लक्षण वाले लोगों को तीन दिन के लिए क्वारंटीन करने से कोरोना के कुल मामलों में 62 फीसद तक कमी देखी गई है। एक आशावादी परिदृश्य में देखें तो तेजी से बढ़ने वाले मामलों में 89 प्रतिशत की गिरावट दिखी।
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आईसीएमआर के शोधपत्र से ये जानकारी जुटाने की कोशिश की गई है कि तार्किक मध्यवर्ती योजनाओं के इस्तेमाल से कोरोना के असर को कितना रोका जा सकता है? शोध को दो दृष्टिकोण से तैयार किया गया है। पहला ये कि देश की सीमाओं पर कोरोना को रोकने के क्या तरीका चुनें और दूसरा देश में संक्रमित मरीजों को क्वारंटीन करने से क्या लाभ मिला?

शोध का केंद्र बिंदू
शोध में भारत की सीमा नियंत्रण के बदले भारत में विदेशी यात्रा से आए लोगों की निगरानी को ज्यादा महत्व दिया गया है। रिसर्च में गणित संबंधी एक नमूने को पेश किया गया है जो बताता है कि सीमाओं पर अव्यवहारिक तरीके से नियंत्रण करने से ज्यादा बेहतर देश के भीतर क्वारंटीन के लिए संसाधनों पर खर्च करना ज्यादा लाभदायक होता। शोध बताता है कि क्वारंटीन के साथ साथ संक्रमित लोगों की निगरानी पर ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए।

सरकार का ज्यादा फोकस गंभीर संक्रमित मरीजों की टेस्टिंग और क्वारंटीन की सुविधा देना था। सरकार ने शुरुआती हफ्तों में भारत आने वाले गैर संक्रमित यात्रियों का टेस्ट ही नहीं कराया। 

शोध पत्र में संक्रमित मरीजों पर ज्यादा जोर
रिसर्च के मुताबिक अगर देश में चीन से आने वाले हर संक्रमिक यात्री की स्क्रीनिंग की होती तो 45-47 दिनों में संक्रमण के फैलने का पता चल जाता। साथ ही अगर गैर संक्रमित यात्रियों की भी स्क्रीनिंग की जाती तो देश में कोरोना के फैलने में कम से कम 20 दिन की देरी और हो सकती थी। शोध में ये भी जानकारी दी गई है कि थर्मल स्क्रीनिंग से इंफेक्शन से ग्रसित 46% मामले छूट सकते हैं। सभी एयरपोर्ट से संक्रमित लोगों को पहले से ही आइसोलेशन की सुविधा दी जाती तो ये ज्यादा कारगार साबित होता।      

संक्रमित मरीजों का क्वारंटीन कितना असरदार?
शोधकर्ताओं ने दो परिदृश्यों में ये रिसर्च सामने रखी है एक आशावादी परिदृश्य और दूसरा निराशावादी परिदृश्य। आशावादी परिदृश्य का अनुमान है कि एक संक्रमित व्यक्ति से 1.5 व्यक्तियों को वायरस हो सकता है और संक्रमित ना होने पर इंफेक्शन दूसरों को संक्रमित नहीं करेगा। वहीं निराशावादी परिदृश्य का मानना है कि हर संक्रमित व्यक्ति चार लोगों को वायरस फैला सकता है और संक्रमित मामलों की तुलना में आधे असंक्रमित मामले भी इंफेक्शन फैला सकते हैं।

चेन्नई के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (आईएमएस) की स्टडी के मुताबिक भारत की प्रजनन संख्या 1.7 है जो बाकी देशों के मुकाबले काफी कम है। शोध बताता है कि असंक्रमित लोग भी वायरस फैला सकते हैं लेकिन ये साफ नहीं है कि ऐसे लोगों के वायरस फैलाने की क्षमता कितनी है?

आईसीएमआर के शोध से खुलासा
शोध के मुताबिक अगर सामुदायिक संक्रमण फैलता है तो क्वारंटीन में रखें संक्रमित लोगों की वजह से महामारी के तेजी से फैलने पर ज्यादा प्रभाव पड़ता लेकिन ये आशावादी परिदृश्य के आधार पर कहा जा रहा है। इससे फैलने वाले मामलों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा लेकिन देश की स्वास्थ्य सुविधाओं पर जरूर प्रभाव डाल सकता है। 

रिसर्च के मुताबिक 50 फीसदी संक्रमित लोगों को तीन दिन के लिए क्वारंटीन में रखने से कोरोना के कुल मामलों में 62 प्रतिशत कमी देखी जा सकती है। एक आशावादी परिदृश्य में देखें तो तेजी से बढ़ने वाले मामलों में 89 फीसद की गिरावट दिखती। वहीं निराशावादी परिदृश्य में कुल मामलों में दो फीसदी और तेजी से बढ़ने वाले मामलों में आठ फीसदी की कमी दिखती। 

शोध पत्र में किन क्षेत्रों पर जोर
शोध में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बंगलुरू को ये मानकर शामिल किया गया है कि इन महानगरों में ज्यादा तेजी से वायरस फैला होगा। शोध में एक दूसरे रिसर्च के वैश्विक जोखिम मुल्याकंन को शामिल किया गया है जो अनुमान लगाता है कि किसी संक्रमित व्यक्ति के विमान ये यात्रा करने से लेकर उसके आखिरी मंजिल तक संक्रमण की प्रायिकता 0.209 प्रतिशत है। मुंबई, कोलकाता, बंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद और कोच्चि के बाद दिल्ली में जोखिम की दर तुलनात्मक तौर पर 0.064 फीसद है। 

शोध से मिली दिलचस्प जानकारी
आईसीएमआर के शोध पत्र ने कोरोना से होने वाली हर मृत्यू के लिए आठ से 10 गंभीग और 40-50 सामान्य मामलों का अनुमान सामने रखा है। आईसीएमआर के रिसर्च के मुताबिक 5% संक्रमित लोगों को आईसीयू जैसी सुविधा की जरूरत है और उनमें से आधे लोगों को वेंटिलेटर की जरूरत है। 

शोध की सीमाएं?
शोध ने चीन से आने वाले यात्रियों को लेकर अनुमान लगाया है जबकि अब हमारे सामने ये तथ्य कि भारत ज्यादा मामले मध्य पूर्वी देशों और यूनाइटेड किंगडम से आए हैं। शोध में चीन के संक्रमित इलाकों से रोजाना आने वाले 500 यात्रियों का भी आंकड़ा लिया गया है। रिसर्च में शहरी और ग्रामीण स्थानांतरण को अनदेखा किया है। केवल ट्रेन और बसों से हुई यात्रा के आधार पर अनुमान लगाया गया है। इसके अलावा शोध में इंफेक्शन की अवधि, इंफेक्शन के विकास की अवधि और मृत्यू दर के अनुमान पर कुछ साफ जानकारी नहीं दी गई है।
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