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अमर उजाला से विशेष बातचीत में बोले जफर सरेशवाला, मुस्लिम समाज में चल रही बदलाव की क्रांति

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 05 Jun 2020 07:46 PM IST

सार

  • अमर उजाला डॉट कॉम (www.amarujala.com) की मुस्लिम स्कॉलर जफर सरेशवाला से विशेष बातचीत  
  • जफर सरेशवाला ने कहा, मुस्लिम समुदाय के युवाओं में कट्टरपंथी विचारधारा की जगह आधुनिक शिक्षा के प्रति लगाव तेजी से बढ़ रहा है
  • कहा, भाजपा के कुछ लोगों की बयानबाजी ने बिगाड़ी भारत की छवि लेकिन वक्त रहते मोदी ने संभाला 
  • स्वास्थ्यकर्मियों पर हुए निंदा की कड़ी आलोचना की
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Zafar Sareshwala
Zafar Sareshwala - फोटो : अमर उजाला (फाइल)

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विस्तार

मुस्लिम विद्वान जफर सरेशवाला ने कहा कि मुस्लिम समाज में धार्मिक कट्टरता की जगह आधुनिक शिक्षा के प्रति लोगों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। अब लोग धार्मिक गुरुओं को केवल मस्जिद तक ही सीमित रखना चाहते हैं।
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बाहर निकलकर वे आधुनिक शिक्षा की तरफ देख रहे हैं क्योंकि मुस्लिम समुदाय को इस बात का अहसास हो गया है कि शिक्षा के बिना उनकी तरक्की संभव नहीं हो सकती। इस सोच का जमीनी असर दिखने में कुछ वक्त अवश्य लगेगा, लेकिन यह बड़ा बदलाव आने वाले समय में दिखाई पड़ेगा।


जो इस समाज और दुनिया के लिए बहुत अच्छा होगा। जफर सरेशवाला ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम देशों में भारत की जो सकारात्मक छवि बनाई थी, उसे कोरोना काल में उनकी ही पार्टी के कुछ लोगों ने अपने अधिकारिक ट्विटर हैंडल और फेसबुक अकाउंट से तब्लीगी जमात और मुसलमानों के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी करके काफी नुकसान पहुंचाया।

लेकिन सही वक्त पर दखल देकर प्रधानमंत्री मोदी ने उसे फिर संभाल लिया है।

मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) के पूर्व चांसलर जफर सरेशवाला ने अमर उजाला डॉट कॉम से शुक्रवार को विशेष बातचीत के दौरान कहा कि गुजरात में एक ऐसा दौर था, जब आये दिन दंगे होते थे, कई दिनों के कर्फ्यू लगते थे।

लेकिन 2002 के दंगों के बाद मुस्लिम समुदाय ने आगे बढ़ने की तरक्की पसंद सोच को अपनाया। लोगों ने इसकी शुरुआत प्राथमिक शिक्षा से की। इसका परिणाम आज यह हुआ है कि अकेले अहमदाबाद में 64 स्कूल केवल मुस्लिम समाज के लोगों के द्वारा चलाये जा रहे हैं, जिनमें तीन स्कूल स्वयं उनके परिवार के लोग चला रहे हैं।

उन्होंने कहा कि इस सोच को आगे बढ़ाने के लिए वे स्वयं 45 देशों और यूपी के दर्जनों शहरों में लगातार सक्रिय हैं। उनका मानना है कि आने वाले समय में इसका बड़ा बदलाव जमीनी स्तर पर दिखाई पड़ेगा।
 
लंबे समय में लोगों के बीच इस तरह का संदेश गया है कि मुस्लिम समुदाय में धार्मिक कट्टरता ज्यादा प्रभावी है।

धार्मिक कट्टर विचार रखने वाले नेताओं की तुलना में आधुनिक शिक्षा और तरक्कीपसंद सोच के हिमायती लोग समाज में पीछे रह जा रहे हैं। इस तरह की सोच के पीछे क्या कारण हो सकता है? 

अमर उजाला के इस सवाल पर मुस्लिम विद्वान जफर सरेशवाला ने कहा कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि मुस्लिम समाज में लंबे समय से मौलाना आजाद और सर सैय्यद अहमद खां जैसे विद्वान नेता पैदा नहीं कर पाया।

इसकी जिम्मेदारी देश के राजनीतिक दलों पर भी है कि उन्होंने मुस्लिम समाज में आधुनिक सोच के विद्वान नेताओं को आगे नहीं बढ़ाया। 

मुस्लिम समाज के नेता कभी इंदिरा गांधी बने, तो कभी मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव। उन्होंने कहा कि लेकिन अब बदलाव आ रहा है और मुस्लिम समाज धार्मिक जकड़न से आगे बढ़ने की सोच पर आगे बढ़ रहा है।

तब्लीगी जमात में कोई कमी नहीं

सरेशवाला ने कहा कि देश में कोरोना संक्रमण को फैलाने के लिए कुछ लोगों ने तब्लीगी जमात को दोषी ठहराने की कोशिश की, लेकिन यह बहुत संकुचित सोच थी।

इससे भारत की छवि पूरी दुनिया में प्रभावित हुई। लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी ने इस कमी को समझा और मुस्लिम देश के नेताओं से बातचीत की। इससे स्थिति संभली। 

लेकिन आज लोगों को इस बात का अहसास हो गया है कि यह किसी धर्म-संप्रदाय से जुड़ा मामला नहीं है। यह एक बीमारी है जो किसी भी धर्म-संप्रदाय, लिंग और किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है।
 
उन्होंने कहा कि वे लंबे समय से तब्लीगी जमात के कार्यक्रमों में आते-जाते रहे हैं। देश की रॉ-आईबी जैसी संस्थाओं से जुड़े उच्च लोग यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि तब्लीगी जमात में कोई खराबी नहीं है।

इससे जुड़ा कोई व्यक्ति अच्छा-बुरा हो सकता है। उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं मौलाना साद से इस कार्यक्रम को रोकने की बात कही थी, लेकिन उन्होंने यह सलाह नहीं मानी जिससे जमात की किरकिरी हुई।
 
हालांकि, जब जमात से जुड़े लोगों ने अपना प्लाज्मा दान, गरीबों की मदद और श्रमिकों को उनके घर पहुंचाने के दौरान उन्हें मदद देना शुरू किया, तब इस छवि में बदलाव आया।
 
उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस कुछ समय में ठीक हो जाएगा, इसका इलाज खोज लिया जाएगा। लेकिन कोरोना वायरस से ज्यादा खतरनाक सांप्रदायिकता का वायरस है, जिसका इलाज करने की ज्यादा जरूरत है, अन्यथा आने वाले समय में यह देश और समाज को ज्यादा बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।
 
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले बेहद निंदनीय हैं और इसकी कड़ी आलोचना होनी चाहिए। उन्होंने अपने स्तर पर जांच के बाद यह पाया था कि इंदौर और मुरादाबाद में स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले हुए थे।

इससे समाज की छवि को गहरा नुकसान पहुंचता है। इस तरह की किसी भी घटना को रोका जाना चाहिए।
 
उन्होंने कहा कि देश की आर्थिक स्थिति को सही करने के लिए मांग को बढ़ाने की जरूरत है। देश के गरीब लोगों को राशन और नकदी की मदद की जानी चाहिए। एक बार लोगों को मदद मिलनी शुरू हो जायेगी, तब अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आएगी। 

उन्होंने कहा कि इंग्लैंड में सरकार ने लॉकडाउन के पहले कंपनियों को सीधी आर्थिक मदद देना शुरू कर दिया। आज भी वहां लोगों का 85 फीसदी वेतन सरकार के खजाने से दिया जा रहा है।

इसी तरह के उपाय कर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की कोशिश शुरू करनी चाहिए।     
 

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