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फ़िक्र-ए-ग़ुर्बत है न अंदेशा-ए-तन्हाई है: अमीर क़ज़लबाश

इरशाद

फ़िक्र-ए-ग़ुर्बत है न अंदेशा-ए-तन्हाई है: अमीर क़ज़लबाश

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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फ़िक्र-ए-ग़ुर्बत है न अंदेशा-ए-तन्हाई है 
ज़िंदगी कितने हवादिस से गुज़र आई है 

लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं 
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है 

हम न सुक़रात न मंसूर न ईसा लेकिन 
जो भी क़ातिल है हमारा ही तमन्नाई है 

ज़िंदगी और हैं कितने तिरे चेहरे ये बता 
तुझ से इक उम्र की हालाँकि शनासाई है 

कौन ना-वाक़िफ़-ए-अंजाम-ए-तबस्सुम है 'अमीर' 
मेरे हालात पे ये किस को हँसी आई है 
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