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gulzar best nazm

इरशाद

गुलज़ार कहते हैं कि 'इससे बेहतर नज़्म क्या होगी'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होंटों पर
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादा काग़ज़ पे लिख के नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इस से बेहतर भी नज़्म क्या होगी

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