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कैद परिंदे

इरशाद

कैद परिंदे का बयान - दुष्यंत कुमार

अमर उजाला काव्य डेस्क-नई दिल्ली

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तुमको अचरज है मैं जीवित हूँ!
उनको अचरज है मैं जीवित हूँ!
मुझको अचरज है मैं जीवित हूँ!

लेकिन मैं इसीलिए जीवित नहीं हूँ
मुझे मृत्यु से दुराव था,
यह जीवन जीने का चाव था,
या कुछ मधु-स्मृतियाँ जीवन-मरण के हिंडोले पर

संतुलन साधे रहीं,
मिथ्या की कच्ची-सूती डोरियाँ
साँसों को जीवन से बाँधे रहीं;
नहीं--
नहीं!
ऐसा नहीं!! आगे पढ़ें

बल्कि मैं जिंदा हूँ...

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