आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Irshaad ›   hindi poet ramdhari sing dinkar on life
हिंदी कविता

इरशाद

बोधि-सत्व-रामधारी सिंह दिनकर

अमर उजाला काव्य डेस्क-नई दिल्ली

138 Views
सिमट विश्व - वेदना निखिल बज उठी करुण अन्तर में,
देव! हुंकरित हुआ कठिन युगधर्म तुम्हारे स्वर में।
कॉंटों पर कलियों, गैरिक पर किया मुकुट का त्याग,
किस सुलग्न में जगा प्रभो! यौवन का तीव्र विराग?

चले ममता का बन्धन तोड़
विश्व की महामुक्ति की ओर।

तप की आग, त्याग की ज्वाला में प्रबोध सन्धान किया,
विष पी स्वयं, अमृत जीवन का तृषित विश्व को दान किया।
वैशाली की धूल चरण चूमने ललक ललचाती है,
स्मृति-पूजन में तप-कानन की लता पुष्प बरसाती है।

बट के नीचे खड़ी खोजती लिये सुजाता खीर तुम्हें;
बोधिवृक्ष-तल बुला रहे कलरव में कोकिल-कीर तुम्हें।
शस्त्र-भार से विकल खोजती रह-रह धरा अधीर तुम्हें।
प्रभो! पुकार रही व्याकुल मानवता की जंजीर तुम्हें।

आह! सभ्यता के प्रांगण में आज गरल-वर्षण कैसा!
घृणा सिखा, निर्वाण दिलानेवाला यह दर्शन कैसा!
स्मृतियों का अन्धेर! शास्त्र का दम्भ! तर्क का छल कैसा!
दीन, दुखी, असहाय जनों पर अत्याचार प्रबल कैसा!

आज दीनता को प्रभु की पूजा का भी अधिकार नहीं,
देव! बना था क्या दुखियों के लिए निठुर संसार नहीं?
धन-पिशाच की विजय, धर्म की पावन ज्योति अदृश्य हुई;
दौड़ो बोधिसत्व! भारत में मानवता अस्पृश्य हुई।

धूप-दीप, आरती, कुसुम ले भक्त प्रेमवश आते हैं;
मन्दिर का पट बन्द देख जय कह निराश फिर जाते हैं।
शबरी के जूठे बेरों से आज राम को प्रेम नहीं;
मेवा छोड़ शाक खाने का याद पुरातन नेम नहीं। आगे पढ़ें

पर, गुलाब-जल में गरीब के अश्रु राम क्या पायेंगे...

सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!