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जयशंकर प्रसाद: हे सागर संगम अरुण नील !

इरशाद

जयशंकर प्रसाद: हे सागर संगम अरुण नील !

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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हे सागर संगम अरुण नील !
          अतलांत महा गम्भीर जलधि-
          तज कर अपनी यह नियत अवधि,
लहरों के भीषण हासों में ,
आकर खारे उच्छवासों में
          युग-युग की मधुर कामना के-
          बंधन को देता जहाँ ढील 
          हे सागर संगम अरुण नील ! आगे पढ़ें

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