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डाॅ. ओम निश्चल: यह सुबह का स्नेह निर्झर मन, छा रही कारी घटा आँगन

इरशाद

डाॅ. ओम निश्चल: यह सुबह का स्नेह निर्झर मन, छा रही कारी घटा आँगन

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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यह सुबह का स्नेह निर्झर मन
छा रही कारी घटा आँगन
तुम जगो तो भोर यह जागे
और तंद्रा अलस की भागे;

हुलस जाए बावरा यह मन
गा उठे आषाढ़ में सावन। आगे पढ़ें

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