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परवीन शाकिर

इरशाद

परवीन शाकिर: पैरों की मेहँदी मैंने किस मुश्किल से छुड़ाई थी

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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पैरों की मेहँदी मैंने 
किस मुश्किल से छुड़ाई थी
और फिर बैरन ख़ुश्बू की
कैसी-कैसी विनती की थी 
प्यारी धीरे-धीरे बोल 
भरा घर जाग उठेगा
लेकिन जब उसके आने की घड़ी हुई
सुबह से ऐसी झड़ी लगी 
उम्र में पहली बार मुझे 
बारिश अच्छी नहीं लगी
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