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Shahryar

इरशाद

तेरे वा'दे को कभी झूट नहीं समझूँगा: शहरयार

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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तेरे वा'दे को कभी झूट नहीं समझूँगा 
आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा 

देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है 
आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा 

मेरी तन्हाई की रुस्वाई की मंज़िल आई 
वस्ल के लम्हे से मैं हिज्र की शब बदलूँगा  आगे पढ़ें

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