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tahzeeb hafi ghazal ye ek baat samajhne mein raat ho gayi hai

इरशाद

ये एक बात समझने में रात हो गई है, मैं उस से जीत गया हूं कि मात हो गई है - तहज़ीब हाफ़ी

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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ये एक बात समझने में रात हो गई है
मैं उस से जीत गया हूं कि मात हो गई है

मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊंगा
मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है

बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूंगा सोचा था
तिरी जुदाई ही वज्ह-ए-नशात हो गई है

बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ' मैं ने किया
बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है

मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूं छोड़ के घर
ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है

रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र
मैं नज़्म लिखने लगा था कि नात हो गई है

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