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'बाघ' कविता में जीवन की चुप्पियाँ और आवाजें साफ-साफ़ सुनाई देतीं हैं...

काव्य चर्चा

'बाघ' कविता में जीवन की चुप्पियाँ और आवाजें साफ-साफ़ सुनाई देतीं हैं...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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समकालीन हिंदी कविता के क्षेत्र में केदारनाथ सिंह उन गिने-चुने कवियों में से हैं जिनमें 'नयी कविता' उत्कर्ष पर पहुँचती है। गाँव और शहर, लोक और आधुनिकता, चुप्पी और भाषा एवं प्रकृति और स्कृति सभी पर संवाद चलता रहता है। 'बाघ' कविता संग्रह पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय रही है। ‘बाघ’ कविता के हर टुकड़े में बाघ चाहे एक अलग इकाई के रूप में दिखाई पड़ता हो, पर आख़िरकार सारे चित्र एक दीर्घ सामूहिक ध्वनि-रूपक में समाहित हो जाते हैं। कविता इतने बड़े फलक पर आकार लेती है कि उसमें जीवन की चुप्पियाँ और आवाजें साफ-साफ़ सुनाई देंगी। 




इस तरह चलता रहा 
महान जीवन उस छोटे-से नगर का 
बुद्ध की करुणा 
और बाघ के आतंक की 
एक-दूसरे को काटती हुई 
दोहरी छाया में 

वहां लोगों का ख़याल था 
कि बुद्ध समझते हैं 
बाघ की भाषा 
पर बेचारे बाघ के लिए 
बुद्ध की की पाली 
घास की तरह सुन्दर थी 
और एकदम अखाद्य  आगे पढ़ें

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