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कुंभ मेला 2019: रामचरित मानस में तीर्थराज प्रयाग की महिमा

काव्य चर्चा

कुंभ मेला 2019: रामचरित मानस में तीर्थराज प्रयाग की महिमा...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।
सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ॥ 104॥


अनुवाद: तब प्रभु रघुनाथ गणेश और शिव का स्मरण करके तथा गंगा को मस्तक नवाकर सखा निषादराज, छोटे भाई लक्ष्मण और सीता सहित वन को चले॥ 

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू
प्रात प्रातकृत करि रघुराई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥


अनुवाद: उस दिन पेड़ के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मण और सखा निषादराज ने विश्राम की सुव्यवस्था कर दी। प्रभु राम ने सबेरे प्रातःकाल की सब क्रियाएँ करके जाकर तीर्थों के राजा 'प्रयाग' के दर्शन किए। आगे पढ़ें

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