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Maa..

काव्य चर्चा

मां

Manoj Sharma

1 कविता

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जिस घर में मैंने जन्म लिया
जिस आंगन में दौड़ा खेला
मां बिन आज वही मुझको
लगता है जैसे हो मुसाफिरखाना

दिन दाे चार भले रुक जाऊं यहां
मां बिन सब सूना सूना लगता है
राह भूल कर भटका हो पक्षी कोई
मेरे मन को कुछ ऐसा लगता है

बंधु, सखा, परिजन, पुरजन
सब पहले जैसे ही मिलते हैं
पर मां बिन मेरे मन उपवन में
फूल खुशी के ना खिलते हैं

घर की जिस चीज पर पड़े नजर
सब में मां की तस्वीर उभरती है
मां की ना जाने कितनी आकृतियां
मेरे अंतर्मन पर छा जाती हैं

अलमारी में जो तस्वीर है मां की
मानाे कुछ बोलने ही वाली है
अक्सर भ्रम होता है मुझको
जैसे मां कुछ कहने वाली है

-मनोज शर्मा

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