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काव्य चर्चा

मेरे जीवन का अनुभव

Manveer Singh

14 कविताएं

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मरने की अभिलाषा लेकर
जीवन की भीख में मागूं क्यों
जव तोड़ दिये बंधन सारे
तो निद्रा से क्यों न जागूं मैं
बस एक व्यथा जीवन को
निज पथ से भटकाती रहती है
स्व: त्व: के बंधन में बंधकर
तम को दर्शाती रहती हैं।

(२)
हास्य और करूणा का
जन्म मंथन करके देख लिया
प्रेम और रति के झरनों का
अस्वादन करके देख लिया
मोह और माया के
बंधन का पाठ पढ़ा मैंने
सब तुच्छ और निर्मूल व्यथा
समस्त अवसादों का कारण
क्षणिक सुखों में लिप्त हुआ
नश्वर है ये सब वर्ण
इसका भी अनुभव हैं मुझकों

(३)
क्या सत्य असत्य
क्या आदि अनन्त
क्या चल अविचल
क्या देव और क्या मृत्यु लोक
वसुधा पर हैं वाशन इनका
कर्मों का फल हैं सब
शेष कथन तो हैं मिथ्या

(४)
कर्मण्येवाधिकारस्ते को निज
जीवन में तुम धारण करना
स्वाभिमान और कृत्य पूर्ण
जीवन तुम व्यतीत करना
निज पथ से ना विचलित होना
किन्चित मन के भावों को लेकर
हंसते हंसते मर जाना
यह अभिलाषा लेकर।

-मनवीर सिंह
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