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सावन विशेष: अवधी कजरी- बाबा ! निबिया के पेड़ जिनि काटेउ

काव्य चर्चा

सावन विशेष: अवधी कजरी- बाबा ! निबिया के पेड़ जिनि काटेउ

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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लोकगीत वह माध्यम है जिसमें समाज स्वयं को अभिव्यक्त करता आ रहा है। लोकसंगीत में उल्लास की अनंत संभावनाएं हैं, जिसके कारण यह हमेशा से लोगों के मन को लुभाता रहा है।लोकगीतों में जैसे विवाह के गीत हैं, खेती के गीत हैं, वैसे ही ऋतुओं के गीत भी हैं। बारिश में सावन के महीने में अवधी में 'कजली' की परंपरा रही है। प्रस्तुत है सावन गीत- 

सावन:- 
बाबा ! निबिया के पेड़ जिनि काटेउ, निबिया चिरैया बसेर 
बिटियन जिनि दुख देहु मोरे बाबा, बिटियै चिरैया की नांय 
सगरी चिरैया रे उड़ि जइहैं बाबा, रहि जइहैं निबिया अकेलि 
सगरी बिटियवे चली जइहैं सुसरे, रहि जइहैं मइया अकेलि 


भावार्थ:- बाबा ! नीम का पेड़ मत काटिए, क्योंकि इस पर चिड़ियों का बसेरा है, और बेटियां इन्हीं पक्षियों की तरह होती हैं इसलिए बेटियों को दुख मत दीजिए। एक दिन ये चिड़िया उड़ जाएगी और नीम का पेड़ अकेला रह जाएगा। सारी बेटियां अपने ससुराल चली जाएंगी और मां अकेली रह जाएगी।  
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