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दुष्यंत कुमार

मैं इनका मुरीद

इंसानी जज़्बे को अनवरत उजियारे से आप्लावित करते दुष्यंत कुमार

शरद मिश्र ,अमर उजाला काव्य डेस्क-नई दिल्ली

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हिंदी साहित्य जगत में धूमकेतु की तरह चमकते दुष्यंत कुमार की सोच जीवन को खंगाल कर कुछ नया करने की ओर प्रेरित करती है | बचपन में हिंदी के प्रोफ़ेसर पिता के मुख से इस महान कवि की पंक्तियाँ  मन को सुनने को मिली और बचपन इनसे प्रभावित होने लगा| नतीजा यह है कि आज भी जब कभी मन निराश होने लगता है तो दुष्यंत कुमार की पंक्तियों से ही सहारा मिलता है, दुष्यंत क़ुमार के चटकीले  शब्दों और अदम्य साहस की वजह से ही मन उनका  मुरीद हो गया|  आगे पढ़ें

हिंदी की ग़ज़लों का सहारा लेते हुए पूरी उर्दू दुनिया को चुनौती...

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