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आधुनिक भारत की आत्मा को समझने का आधार हैं केदार नाथ सिंह की कविताएं...

मैं इनका मुरीद

आधुनिक भारत की आत्मा को समझने का आधार हैं केदार नाथ सिंह की कविताएं...

डाॅ. कृपाशंकर चौबे, वर्धा

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हिंदी भाषिक समाजों में केदारनाथ सिंह के काव्य को जितनी स्वीकृति मिली, उतनी उनके समकालीन किसी अन्य कवि को नहीं मिली। कुछ वर्ष पूर्व केदार जी को कोलकाता में जब साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता दी गई थी तो सुनील गंगोपाध्याय समेत शायद ही कोई बांग्ला लेखक हो, जो समारोह में उपस्थित न हुआ हो। मुझे याद है कि सुभाष मुखोपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय, नीरेंद्रनाथ चक्रवर्ती, नवारुण भट्टाचार्य आदि ने बांग्ला में अनूदित ‘अकालेर सारस’ की कविताओं की कई बार प्रशंसा की थी। 

ऐसा नहीं है कि केवल बांग्लाभाषी समाज ने ज्ञानपीठ पुरस्कार पानेवाले केदारजी को मान दिया, उन्हें दूसरे भाषिक समाजों ने भी सम्मानित किया था। केदार जी को आंध्रप्रदेश का जाशुआ पुरस्कार, केरल का कुमारन आशान पुरस्कार और ओड़ीशा का जीवन भारती सम्मान भी मिला था। केदारनाथ सिंह की अखिल भारतीय स्वीकृति का कारण कहीं न कहीं उनका अखिल भारतीय बोध भी था। वह भारत बोध रवींद्रनाथ ठाकुर के विश्व बोध के निकट था। केवल भारत ही नहीं, विश्व की कई भाषाओं ने भी केदारजी की कविताओं का अनुवाद हुआ था और दूसरे देशों में केदारजी भारत के प्रतिनिधि कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे। मुझे लगता है कि आधुनिक भारत की आत्मा को समझना है तो केदार जी की कविताएं आधार बन सकती हैं।

माँ मेरे अकेलेपन के बारे में सोच रही है
पानी गिर नहीं रहा
पर गिर सकता है किसी भी समय
मुझे बाहर जाना है
और माँ चुप है कि मुझे बाहर जाना है
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