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मेरे अल्फाज़

जीवन के अरण्य में मुक्ति का द्वार

Anonymous User

4 कविताएं

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मन पर हावी हुआ विचार
कहाँ है जीवन का आर-पार?
सोचा फिर!
जहाँ कहीं पर है जीवन
होगा फिर उसका मरण
जीवन है मृत्यु की छाया
और मृत्यु का है जीवन!

जीवन-मरण है जहाँ पर
उसको जानो तुम संसार
इसका न कोई आर-पार
भटके जीव यहाँ बार-बार
जहाँ से चला वहीं फिर पहुँचा
क्योंकि है यह गोलाकार!

इसको न कोई होश-चेत है
घिरा चहुँ ओर है अंधकार
झूठे सुख में मगन हुआ यह
करके अपना पथ-अवरोध
बार-बार यह विचर रहा है
भूल के अपना अस्तित्व-बोध!

जीवन-अरण्य से निकले तब-
जब हो ऐसा कोई कमाल
मानव-तन मिल जाए फिर,
मिले कोई गुरु दाता दीनदयाल!
गुरु-दया से उसको फिर,
मिल जाए मुक्ति का द्वार!

-अवनीश कुमार
नाथनगर, संत कबीर नगर


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