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मेरे अल्फाज़

मन का मजदूर

Anonymous User

4 कविताएं

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मुझे समझ में नहीं आता है
मजदूरों को लोग,
देखते हैं
क्यों इतनी हेय दृष्टि से?
डाँटते, फटकारते, गरियाते

अभी कुछ ही दिन
पहले की बात थी,
एक महाशय ने,
अपने मजदूर को
उससे, जरा-सी
गलती क्या हो गयी
गरिया दिया।
उसने, थोड़ा-सा
विरोध क्या कर दिया,
महाशय ने,
ईंट उठा लिया, मारने को।

शायद!
वह भूल गए
वह भी तो हैं
मजदूर, मन के,
पता नहीं कब से?
शायद!
कई युगों से,
मन भी दिए जा रहा है,
ईंटों पे ईंट
लेकिन वे हैं,
अन्जान इससे!

-अवनीश कुमार
नाथनगर, संत कबीर नगर


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