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मेरे अल्फाज़

आशायें..

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आशाओं के कुछ दीप लिये,
अब घर घर हूँ मैं घूम रहा।
जिस मिट्टी ने है जनम दिया,
इस मिट्टी को मैं चूम रहा।

कब समय मिला था साथ रहें,
डिजिटल से हटकर हाथ रहें।
जो साथ मिला है अपनों का,
देखो मलंग हूँ झूम रहा।

खाली कमरा मैं कहता हूं,
जो यदा कदा ही सजता हूँ।
अब भरा हुआ मैं अपनों से,
ना बन्द हुआ मैं रूम रहा।

हाँ माना कि परेशानी है,
पर हाथ विजय ही लानी है।
जो भूख यहां है बहुत बड़ी,
ये मानव तो मासूम रहा।

ये विपदा तो आयातित है,
पर भूल न हो ये शापित है।
हम सीधे सादे वासी हैं,
ये हमको कब मालूम रहा।

आओ मिल हम सब लड़ते हैं,
सबकी ख़ातिर कुछ करते हैं।
ये दर्द मेरा न तेरा है,
अब हर कोई मज़लूम रहा।

ना बैठ रहो कुछ नया करो,
बातें तो सबकी बयां करो।
बनना जो भाग्यविधाता था,
वो बैठा क्यूं महरूम रहा।

- रजनीश "स्वच्छंद"

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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