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मेरे अल्फाज़

छोड़ो भी

Abdul Hameed

83 कविताएं

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व्यवहार पुराना मनमाना छोड़ो भी।
शोले अंगारे बरसाना छोड़ो भी।

मिलने जुलने पर पाबंदी आयद है,
बाहर तुम अब आना जाना छोड़ो भी।

चारागर की बात ज़रा सी सुनलो अब,
चाट पकौड़ी ज़्यादा खाना छोड़ो भी।

लेकर आयी है दुनिया संगीत नया,
कल का वो ही राग पुराना छोड़ो भी।

धूप कड़ी है और सफर लम्बा तेरा,
फूलों के जैसा मुरझाना छोड़ो भी।

हमीद कानपुरी
अब्दुल हमीद इदरीसी

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