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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

Akash Deep

3 कविताएं

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जब तड़प-तड़प के दिल से आह पर आह निकली
तब दर्दे दिल के लिए आशिक़ की भी वाह निकली

मर-मर के जब समझो मिट ही गई याद-ए-जानां
तब जाके कहीं दिल से दिलरुबा की चाह निकली

यहां दिल की करतूतों का सारा हिसाब कौन रखे
ख़्वाब मे लिपटी आंख ही आख़िरी गवाह निकली

बुझ-बुझ के बुझती ही रही उम्मीद की रोशनी भी
मेरी मंज़िल के लिए एक से एक भयंकर राह निकली

दिल के लुटने का ख़ौफ़ और दिल न लगाने की कसम
हाय! तौबा 'आकाश' ये तो ज़िंदगी ही तबाह निकली


- Akashdeep
Ph.D. Research Scholar
Banaras Hindu University,
Varanasi 221005

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