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मेरे अल्फाज़

बेबस हथिनी और क्रूर मानव

Anand Pratap

46 कविताएं

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हैवानियत की इस दास्ताँ ने
मानवता को दहला दिया ,
क्या कसूर था उस माँ का
जिसे मौत के पटाखों से जला दिया ।
और जो खेला न ममता के आँचल में
उसे भी काल की गोदी में सुला दिया ।।
क्या यही मानव का कर्म है
जिसने छोड़ा दया का धर्म है,
दिखता न इसे जीवों का भी मर्म है
कर रहा स्वार्थ की आड़ में दुष्कर्म है ।
झुक गया है सिर आज शर्म और लाज से
क्रूरों के इस अधम और दुष्काज से ।।

- आनंद प्रताप सिंह
इलाहाबाद विश्वविद्यालय


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