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मेरे अल्फाज़

मिट्टी का आँगन

Anu papanai

10 कविताएं

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जाने कहां गुम हो गए वह सादगी भरे मन,
वह पेड़ों की छांव और मिट्टी के आंगन|
छोटे-छोटे घरों में रहते थे बड़े परिवार,
फिर भी भरा रहता था दिलों में जहां प्यार|
कच्चे थे फर्श मगर रिश्ते दिलों के पक्के थे,
सुविधाएं कम जरूर थी मगर फिर भी वह दिन अच्छे थे|
दादा दादी की कहानियों से जहां आती थी नींद ,
कल फिर नई कहानी सुनने की साथ लिए उम्मीद|
चूल्हे की रोटियों में सिकता था मां का प्यार ,
स्वाद और बढ़ जाता था जब मिलता था घर का अचार|
आज के पिज़्ज़ा बर्गर में कहां है वह स्वाद,
चूल्हे के बने उस खाने की अलग ही थी बात |
बच्चों की खिलखिलाहट से गूँज उठता था घर-घर ,
दौड़, कबड्डी,आँख मिचोली खेला करते थे दिनभर |
आज इन मोबाइलों ने खत्म कर दिए सारे खेल ,
अलग-थलग रहते हैं बच्चे नहीं जानते दिल के मेल |
आधुनिकता की दौड़ में अंधा हो गया मानव है,
जो रिश्तो का गला घोंट दे ऐसी आधुनिकता दानव है|
हां जरूरी है परिवर्तन के साथ आगे बढ़ना,
परंतु रिश्तो में परिवर्तन कभी नहीं करना,|
दादा दादी आज भी सुनाएंगे कहानी,
बस बच्चों की मोबाइलों से दूरियां है बनानी |
खेल बचपन के बच्चों को जब खिलाएंगे,
प्रेमभाव की सीख तभी उन्हें सिखा पाएंगे |
रिश्तो की कद्र करें ये जिंदगी को खुशहाल बनाते हैं,
मिट्टी के वो आँगन मिट्टी से जुड़ना सिखाते हैं,
मिट्टी के वो आँगन मिट्टी से जुड़ना सिखाते हैं।

अनु पपनैं


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