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मेरे अल्फाज़

मुफ़लिसी में हम घर बेचा नहीं करते हैं....

Anuj Subrat

12 कविताएं

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मुफ़लिसी में हम घर बेचा नहीं करते हैं
महबूब अगर क़यामत हो तो हम पर्दा नहीं करते हैं

कर ले फिर से भरोसा तुम पर
अब खुद पर इतना भी हम भरोसा नहीं करते हैं

बेवफ़ा है तो क्या हुआ, मोहब्बत है मेरी वह
और अब हम मोहब्बत से कोई शिक़वा नहीं करते हैं

सबब इस दिल के जख़्म का तुम पूछते हो
दर्द अब महफिल में हम बयां नहीं करते हैं

क्यूँ घबरा रही हो तुम अपनी तस्वीर देने से
तेरी तस्वीर का आँखों से अब हम सौदा नहीं करते हैं

मेरे अंदाज-ए-बयां के अब मुरीद तुम नहीं तो कुछ नहीं
अब उसके हुस्न पर हम भी तो लिखा नहीं करते हैं

हिज़्र और तेरी फुरक़त से इतना बेचैन हुआ, दिन-रात हुआ
दर-ब-दर हुआ, बेज़ार हुआ, आँसू अब मेरे हुआ नहीं करते हैं

~ अनुज सुब्रत


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