आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Naree

मेरे अल्फाज़

नारी

Babulal Kushwaha

3 कविताएं

बढ़ रहा नित्य दिन अत्याचार
बैठी तुम नारी होकर लाचार
गर सोच रही मैं लूं अधिकार
तो त्याग उतर जाओ परिहार ।

नारी तुम काली हो
उगता सूरज की लाली हो
ममता की मिसाल
माया की जाल
नारी तुम सारी हो ।

हैवानियत जब हद से
बढ़कर बन जाए शमशीर
तीखी धार बनके तलवार
धड़ से काट दो तुम सिर ।

तुम धैर्य पर रखो वह दिन आएगा
दुष्कर्मीयो का अंत कर गुंजा रमाएगा
करता नारी का हूं सम्मान
इन पर बनी अग्रज विधान ।

नारी रक्षा हेतु आते भगवान
यह युग कलयुग है
कभी होगा कोई अवतार ।

स्वयं की रक्षा करनी है तुम्हें
दो भेद तीर से छाती तुम
कर दो दुष्कर्मी को तार-तार
आके गिड़ गिड़ाये सामने वह
क्षमा हेतु हाथ अपना पसार ।

बाबूलाल कुशवाहा

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!