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मेरे अल्फाज़

जल्दी से जल बरसा

Binoy Kumar

118 कविताएं

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हर मानव उर असह्य ताप से दग्ध हो तरसा,
हे बर्षा रानी ! जल्दी से जल बरसा !

मार्तंड के विदग्ध ताप में,
ग्रीष्म के अमिट छाप में,
दिल के कटु संताप में,
हर मनुष्य अपने आप में

समझे, अपने स्वजन को भी पर सा,
हे बर्षा रानी ! जल्दी से जल बरसा !

निरीह कृषक कुछ ना बोले,
कठोर ग्रीष्म का उपहार,
लिए मुख में फफोले,
तृषित दृष्टि नभ पर बिछाए,

एक चाह लिए, मेरी धरा धाम को हर्षा,
हे बर्षा रानी ! जल्दी से जल बरसा !

क्रूर ग्रीष्मराज की प्रचंड प्रहार,
कूप-नाले सुखा डाले,हां सुखा डाले
अतृप्त मनुष्यों में मचा चीत्कार
बूंद भर भी जल दो, जीभ गीला करने

हे उपर वाले! जीने की अब आस कहाँ?
क्षणभर लगे दूभर सा,
हे बर्षा रानी ! जल्दी से जल बरसा !

हे निर्दया ! छोड़ चेतन की बात,
अचर-जड़ भी हो चुका कभात !
वसुधा फाड़े परपट होंठ,कचोट से
रो रहे बाग-बगीचे लोट-लोट के !

और तू आंख फेर नित्य
बन रही हो वीभत्स सुरसा !
हे बर्षा रानी ! जल्दी से जल बरसा !

श्मशान सा अस्थि-पंजर
दिखा रही ये प्यारी धरती,
एकरूप हो खेत और बंजर
सिखलाए समता का पाठ बन के परती,

मर्यादा सीमा तोड़ चुकी,अब इस तृषित को सरसा,
हे बर्षा रानी ! जल्दी से जल बरसा !

---विनय कुमार विनायक
रामकृष्ण आश्रम हाई स्कूल रोड
दुधानी दुमका



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