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मेरे अल्फाज़

कितनी कड़वी मेरी जुबां कर दी

Dharvender Singh

140 कविताएं

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इक मासूम ने मेरे इश्क में जिन्दगी कुर्बां कर दी
मैनें तो सिर्फ दिल मांगा था उसने मेरे हवाले जां कर दी

मैं चाहे कुछ भी खा लूं मुंह मीठा ही नहीं होता
इक लफ़जे-सच्चाई ने कितनी कड़वी मेरी जुबां कर दी

अंधेरों में भटकते इक चांद ने मुझसे मेरी बीनाई मांग ली
उसकी बेबसी पर तरस खाकर मैंने उसको हां कर दी

जरा सी रोशनी बचा रखी थी हमने खुद के मकां के लिए
मगर जहाँ मुसलसल अंधेरा मिला वो खर्च हमने वहां कर दी

- नामचीन

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