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मेरे अल्फाज़

स्वतंत्रता और बलिदान

Dheeraj Gusain

4 कविताएं

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लेकर इंकलाब का नारा जो आज़ादी लाए थे
स्वयं चढ़े जो फांसी पर और अपने शीश चढ़ाए थे
जिनके बलिदानों के बल पर आजादी का सूर्य उगा 
दूर छटा सब घोर अंधेरा नव आशा का दीप जला

प्रणाम करें उन वीरों को हम शत शत शीश नवाते हैं
उन वीरों की ही गाथाएं आज पुनः फिर गाते हैं
सरल नहीं थी यह आज़ादी कीमत बड़ी चुकाई थी
क्या बच्चे और क्या  बूढ़े थे सब ने दी कुर्बानी थी

सन सत्तावन प्रथम क्रांति जो उद्घोष क्रांति का नाद बजा
लाखों ने अपने मुंडो का समर भूमि में दान दिया
कंपनी का का  दंभ भी टूटा  हिल चुकी सब शाखे थी
बिरसा मुंडा के विद्रोह से आंग्ल सत्ता भी कांपी थी

कोलों के विद्रोहों से और संथाली विद्रोहो से
जोली सांग और नागाओं से खांसी के विद्रोहों से
पालीवाल और पागलपंथी भीलो के आंदोलन से
थर-थर कांपे दुष्ट विदेशी भारत के इन वीरों से

लाला जी की वृद्ध  देह पर हर एक वार विदेशी था
रक्त से रंजित जलियांवाला हर एक बूंद स्वदेशी थी
अमर रहे प्रतिकार उधम का अमर बनी कुर्बानी थी
आज़ादी पर वार गए जो श्रेष्ठ वही जवानी थी

आज़ादी के रंग को रंगती ,शेखर की अंतिम गोली थी
भगत सिंह की आज़ादी का रंग बसंती चोली थी
राजगुरु, सुखदेव से त्यागी बिस्मिल जैसे नायक थे
यह भारत के वीर सपूत, जन जन के जननायक है


-- Dheeraj Gusain


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