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मेरे अल्फाज़

ऐ हवा तेरी खामोशियाँ

dinesh kumar

269 कविताएं

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ऐ हवा तेरी खामोशियाँ
सब कुछ कह जाती है,
तेरी सरसराहट वीराने में भी
हलचल कर जाती है।
जो तू गुजरती है
गुलिस्तानों के गलियारों से,
तेरी छुअन से हजारों खुशबुएँ
जहाँ में बह जाती है।
ऐ हवा आज फिर क्यों
तुम भी थम सी गई हो,
क्या दुनिया की घुटन में
तू भी सहम जाती है।
तेरा थम कर यूँ बहना
कुछ दहशत भरा है,
तेरी संजीदगी में गुस्ताखी
जीवन में गम भर जाती है।
ऐ हवा कब बदलेगी
तू अपना रुख मेरे लिए,
नादान हूँ पर तेरे बिना
जिन्दगी ठहर जाती है।
अलसाई सी सुबह में फिर तेरे झोंकों से
पत्तों का जमीन पर गिरना,
पत्तों की सरसराहट से फिर
तेरे आने की कहानी कह जाती है।
ऐ हवा खुल कर बह
स्वागत है तेरा इस जहाँ में,
आबाद रहे ये ‘जहाँ’ तू
बहकर फिर बिखर जाती है॥


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