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मेरे अल्फाज़

श्मशान वाला दुकानदार

Dr.Manoj Kumar

3 कविताएं

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श्मशान के पास बैठ एक आदमी
बेचता सामान
अन्तिम संस्कार का
करता इंतजार किस किस के
मरने का हर रोज
ताकि भर सके अपने बच्चों का पेट
बना सके ख़ुद का एक मकान
पूरा कर सके सारे अरमान
अपना और घरवालों का
वाह रे कुदरत का खेल
कहीं मरने का मातम है
तो कही समान बिकने की आंतरिक ख़ुशी
रोज सुनता है राम नाम सत्य है
सब यही छोड़ के जाना है
पर इंसान की फितरत
नहीं कर पाता ख़ुशी का इज़हार
दिखता सहानुभूति सब के साथ
करता सबका सम्मान
बेच सके ज्यादा से ज्यादा समान
चाहता वह भी समाज में स्थान
दबा के रखता भावनाओं को
भूल चुका है वह अपनी भी हंसी
देखता रोज बनावटी रोते चिल्लाते लोग
अपनों की अंतिम बिदाई देते
सोचता मन ही मन कल क्या होगा
सुबह आता देखता सन्नाटा
झांकता रहता शमशान के मुख्य द्वार
निकल के दुकान से बार बार
क्या हो गया आज कोई भी नहीं
हे भगवान यह क्या?
कैसे भरूंगा आज बच्चों का पेट
कम से कम एक तो भेज ही डालो
नहीं तो बंद कर दूंगा मैं भी यह दुकान
फिर तुम्हीं करना कल्याण
मैं करता रहता हूं इंतज़ार
सजा कर के दुकान
तुम्हारे भरोसे हर रोज
मत करो विश्वाशघात
मेरे और मेरे बच्चों के साथ
कम से कम एक भेज डालो
पापी पेट का है सवाल

डॉ मनोज कुमार

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