आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Atithi, tum kab jaaoge?

मेरे अल्फाज़

अतिथि तुम कब जाओगे

Garvita Kapoor

1 कविता

188 Views
अतिथि ,तुम कब जाओगे ?
क्यों चले आए ? मुंह उठाए
बिना बुलाए ,बिना बताए
नानी का घर समझकर
कब तक छुट्टियाँ मनाओगे ?
अतिथि तुम कब जाओगे ?

सुना था ,अतिथि के आने से
खुश हो जाता है दिल
सज जाती है महफ़िल,
माहौल हो जाता है चिल-पिल
पर तुम कैसे हो मेहमान ?
आते ही कर दी सड़के वीरान,
गालियां सुनसान,
बंद खिड़की ,दरवाजे और मकान
क्या अतिथि के नाम पर
कलंक का टीका लगाओगे?
अतिथि तुम कब जाओगे ?

प्रेम का संदेश लेकर आते
तो हम भी अतिथि धरम निभाते
दरवाजा खोलकर तुम्हें बुलाते,
सिर आँखों पर बिठाते,
अपने मुंह का निवाला भी तुम्हें खिलाते,
पर तुम तो लाए हो मौत का पैगाम ,
मचा रहे हो कत्लेआम,
इंसानियत को कर रहे हो बदनाम,
जीवन पर लगा रहे हो पूर्ण विराम ।
लौट जाओ ,वरना मुंह की खाओगे
अतिथि तुम कब जाओगे ?

अब जाओ और फिर लौटकर वापिस न आना
जिसने तुम्हें भेजा ,उसे मेरा ये संदेशा पहुंचाना
हम रुके है पर थके नहीं ,
सहमे हैं पर डरे नहीं ,
झुके है पर दबे नहीं,
आज भी तुम जैसे बिन बुलाए
अतिथि का सामना करने का रखते हैं दम
सत्तर साल बाद भी
हमारा जोश ,उत्साह और ऊर्जा नहीं हुई कम
अपनी पर आ गए तो
खुद को सीमा के बाहर
रोता बिलखता पाओगे
अतिथि तुम कब जाओगे ?
अतिथि तुम कब जाओगे ?


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!