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मेरे अल्फाज़

धड़कन

Harikesh Yadav

74 कविताएं

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ऐ दोस्त! कितनी मरतबा समझाऊं तुम्हें
कि तुम मेरे दिल की धड़कन हो!
मेरी तनहाईयों की हमसफ़र हैं तुम्हारी यादें
तुम्हारे नखरओं का नाज़ उठता था
तुम्हें हर पल अपनी मोहब्बत का इतवार दिलाता था
ऐ मेरे बिछड़े चमन! मेरे जज़्बात थक चुके हैं
मेरे दिल को अब धड़कना गंवारा नहीं लगता
सांसें अब थम सी जाती हैं
ऐ मेरे दोस्त! कितनी मरतबा समझाऊं तुम्हें कि
अगर तुम नहीं तो आख़िर फ़िर कौन?
तोड़ दो अब अपना मौन

हरिकेश यादव काशी
हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी


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