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मेरे अल्फाज़

क्या कहने-क्या कहने

Harikesh Yadav

74 कविताएं

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हाथों में तेरे प्रेम की प्याली , वाह भई ! क्या कहने, क्या कहने ?
आंखें तेरी रातें काली , वाह भई! क्या कहने, क्या कहने ?
होठों की तेरी लाली , वाह भई, क्या कहने, क्या कहने?
चाल है तेरी हिरनी सी मतवाली, वाह भई! क्या कहने, क्या कहने?
आवाज़ है तेरी कोयल वाली, वाह भई!क्या कहने,क्या कहने?
सागर की लहरों सी हिलती है तेरे कानों की बाली, वाह भई! क्या कहने, क्या कहने?
बिन तेरे अब जीवन लगता है खाली खाली , वाह भई!क्या कहने,क्या कहने ?
प्रेम का भोजन रखने को चाहिए तेरे दिल की थाली, वाह भई!क्या कहने, क्या कहने?
तुम हो प्रेम की फुलवारी मैं हूं उसका माली , वाह भई! क्या कहने,क्या कहने ?
तूने बिखेरा है अपने हुस्न का जलवा , फैली है चहु दिशा हरियाली, वाह भई! क्या कहने, क्या कहने ?
ख़ुदा भी करता है अब तेरे हुस्न के जलवे की रखवाली, वाह भई! क्या कहने, क्या कहने ?
जानता हूं मैं भी कि ख़ुद पर नाज़ है तुझको
क्योंकि सब दिलवाले कहते हैं तुझको दिलवाली , वाह भई! क्या कहने, क्या कहने ?
प्रेम का उड़ता पंछी है तू बैठी रहती है तू डाली डाली, वाह भई ! क्या कहने, क्या कहने ?

हरिकेश यादव, काशी हिंदू विश्वविद्यालय,वाराणसी

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