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मेरे अल्फाज़

ये जीवन की है सच्चाई

Himangi Tripathi

2 कविताएं

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कहीं से तुम गुज़र जाओ, कहीं से हम गुज़र जाये।
वफा की डोर में बंधकर, शहर से दूर निकल जाये।
न तुम मुझसे मिलो फिर से, न मैं तुमसे मिलूं फिर से।
चाहत को दफ़न कर हम, नयी इक राह पर जाये।

जीवन में जो चाहा है, कब किसको मिला है वो।
मुश्किल से गुज़र कर ही, मंज़िल है मिली सबको।
ये जीवन की है सच्चाई, इससे मुँह न मोड़ो तुम।
यही अब मान लो तुम भी, यही अब मान लूँ मैं भी।

कहीं जब तुम दिखायी दो, कहीं जब मैं दिखायी दूँ।
अन्तस में कहूँ तुमसे, वफा की भी दुहाई दूँ।
करो कोशिश नहीं तुम भी, मुझे पहचानने की अब।
कहीं फिर तुम चले जाओ, कहीं मैं भी निकल जाऊँ।

डॉ. हिमांगी त्रिपाठी

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