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मेरे अल्फाज़

तेरे इश्क़ में खुदगर्ज़ न हो जाऊं मैैैं

Indrajeet Singh

49 कविताएं

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जाने में हूँ कहाँ मुझे ढूँढे न दिल कहाँ मेरा
तेरी उम्मीद में रास्ता कोई गुमनाम न हो जाऊं मेैैैं

में तलाश करता हूँ ख़ुशियों की सिर्फ अपनी खातिर
में इस गरज़ में अपनी कोई ख़ुदगर्ज़ न हो जाऊं मैैैं

मेरी उम्मीद में तो चाहूँ मैैैं सिर्फ तेरा हमसफ़र होना
तेरे सफ़र में कोई नया पत्थर तेरी राहों का न हो जाऊं मैैैं

इतनी शिद्दत से झगड़ता हूँ मैं तेरी ख़ातिर किस्मत से अपनी
तेरे दामन के लिए कोई फसादी नया न हो जाऊं मैैैं

सुना है मैंने वो भी जो एक बार भी नहीं कहा तूने
तेरी महफ़िल के लिए नया तमाशा कोई न हो जाऊं मैैैं

तू तो रखता है सबकी ख़ातिर फ़िक़्र दिल में अपने
में वारिस अकेला तेरे आँचल का नया फिर कैसे हो जाऊं मैैैं 


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