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मेरे अल्फाज़

नन्हा भगवान

Jagdish Prasad

8 कविताएं

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बैठे थे मुंह लटकाए कि अचानक ऐसा समाचार मिला
बाग बाग हुआ दिल ओ दिन गुलजार हुआ

कई दिनों से साथियों से बात ही नहीं हुई थी
जैसे इंसान कोई नहीं, गली सुनसान पड़ी थी

शुक्र है कि प्रभु ने हमें एक नन्हा इंसान दिया
वरना कभी की ये बस्ती वीरान पड़ी थी

गली में थी बस एक लड़की लेकिन वह भी
अपनी ही देहली पर चुपचाप खड़ी थी

अचानक घर घर थालियां बज उठी
सखियों ने मंगल गान किया

जैसे नवचेतना आ गई हो मन में
ऐसा कुछ कुछ आह्वान किया

मैं भी इस धरा का हिस्सा हूं
ऐसा हम सब को ही भान हुआ

फूल खिला है आज पत्थरों में
रेगिस्तान भी मरूद्यान हुआ

अब मैं न कोई दु:ख उठाऊंगी
और जीभर इतना इठलाऊंगी

मुझ सा कोई नहीं धनवान धरा पर
सबको ही समझाऊंगी, बतलाऊंगी

अचानक उस लड़की को जाने ऐसा क्या गुमान हुआ
चिल्ला उठी, थरथरा उठी जैसे आज कोई भगवान हुआ

- जगदीश प्रसाद शर्मा

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