वो कृषक है
आक से तपती धरा को सींच अपने स्वेद कण से
तुख्म तोषित कर हरे है क्षुधा जो जन जन समग्र के
दिव्य दिवस की दामिनी या शुभ्र चांदनी छटा
हाथ उनके फावड़ा और माथे पर गमछा छजा
वो कृषक है
इन्द्र कुपित हो जाए तो पाताल से गंगा निकाले
या अविरल वृष्टि लिपट कोपलों की गात बांधे
स्वयं भी जुट जाए जो हल में पशु का संबल बन के
लुट जाए जो तिल तिल कभी दास कभी सौगात बनके
वो कृषक है
ना हिय अवसाद, आह्लाद कोई अंत: करण
बस दुआ में अनवरत, लहलहाते खेत सोनल
धिक्कार उस समाज को जहां महिराज ही श्रीहीन
फिर भी निरंतर सित संजोए बांचते स्वर्णिम धरोहर
वो कृषक है
कृशकाय, कर्म ही वसन, कातर क्रंदन, अक्षुण्ण मन
ये कैसा विरोधाभास, हलधर? भूमिपुत्र, कर शंखनाद
इस संसृती के संपोषक, संतति ऋणी, तुम ही प्रबाल
हो जाओ स्वरारूढ़ आज; जो हक़ लड़े स्वाभिमान से
वो कृषक है।
*आक - सूर्य
*तुख्म- बीज
*संसृति- संसार
*संतति - संतान
*प्रबाल - कोरल, मजबूत
- लीना झा, मुंबई, महाराष्ट्र
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