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मेरे अल्फाज़

माँ के लिए एक प्रयास

Anonymous User

1 कविता

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तेंतिस करोड़ योनि में रह के
मानव साँसे मिली हैं हम को
निमित्त है जो आने का मेरे,
विशिष्ट मेरा नमन है उनको ।

सम्हाल के मुझे कोख में रखा
दिन प्रति दिन हर कष्ट सहा है
उन नव मास के भारी क्षण को
जीवन का आपने रत्न कहा है ।

बाल काल में मध्य रात को
रुदान से अपने सताता था मैं,
सो रहा हो हर कोई जब तब
नींद से आपको जगाता था मैं ।

भोजन भले ही हो सामने
हाथ भी न लगाता था मैं,
विद्यालय से भूखा आ के
हाथ से आपके खाता था मैं ।

आचरण जब भी अशिष्ट हो मेरे
मन में अपने लिख लेती हैं तब
मिलूं जब भी एकांत वास में
दोष से सीख दे देतीं हैं तब ।

पिता से जब भी डॉट है पड़ती
तुरंत पक्ष मेरा ले लेतीं,
खाने का कुछ मन बड़ा हो
तुरंत हिस्सा अपना दे देतीं ।

घर ना आऊं समय पे अपने
परेशान वो बड़ी हो जातीं,
पिताजी से वो लड़ जातीं
जो बात मुझसे न कर पातीं ।

स्वर्ग के सापेक्ष मैंने
उच्च आपको उससे पाया,
खुद अपने परिपेक्ष से मैंने
माँ को जीव का स्वर्ग बताया ।

साल के सारे हर दिन मेरे
समर्पित आपको सदा रहेंगे
सम्मान, समर्पण, प्रेम के भाव
मेरे आपकी ओर सदा रहेंगे ।

~ Navneet


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