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मेरे अल्फाज़

पहले प्यार में उलझनें

Navneet thakur

2 कविताएं

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बहुत याद आती हैं वो उलझनें,
कागज की कश्ती वो बादल घने,
सखियां कभी क्या बताई नहीं
बेवजह ही रहीं ये मेरी धड़कने।

तेरी गली की वो सारी दुकानें,
आता था मैं जिन पे करके बहाने,
कालेज के तेरे यूं चक्कर लगाए
समझते थे सब तुम समझ ही न पाए,
तुमने देखी नहीं क्या मेरी पलटने,
बेवजह ही रही ये मेरी धड़कने।
बेवजह ही रही ये मेरी धड़कने।।

तारे कितने हैं तोड़े तेरी मन्नतों में,
मैं सोता नहीं था तेरी हसरतों में,
मेरे साथ जगता था ये मेरा शहर
तुम जब भी गए अपनी नानी के घर,
जो लिखीं चिट्ठियां खा रही सिलटने,
बेवजह ही रही ये मेरी धड़कने।
बेवजह ही रही ये मेरी धड़कने।।

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