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मेरे अल्फाज़

प्रवासी मजदूर

Raj Singh

14 कविताएं

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एक तरफ महामारी है
एक तरफ है रोटी
दोनों तरफ ही मौत खड़ी है
कौन बड़ी कौन छोटी

जो भागूं रोटी के पीछे
महामारी को पास बुलाऊं
बिन रोटी के भूखा प्यासा
मौत को कैसे गले लगाऊं

छोड़ परिवार परदेस में आया
दिन रात पसीना बहाया है
पड़ी आपदा,अब कोई नहीं है
सब ने हमें ठुकराया है

नहीं साधन है गांव को जांऊ
जाकर परिवार को गले लगाऊं
सिर पर मौत अब मंडरा रही है
दुख दर्द भी किसे सुनाऊं

सुनसान पड़े हैं रास्ते अब
मौन हुई हैं बयार भी
जन से जन का मिलन रहा नहीं
दूर खड़े हैं यार भी

बेरोजगारी और गरीबी
पहले ही महामारी थी
क्या इतना दुख काफी नहीं था
अब करोना की भी बारी थी

महानगरों में महामारी है
काम नहीं है गांव में
सिर पर कोई छत नहीं है
अब हैं तरूवर की छांव में

पता नहीं अब क्या होगा
कब कहर मिटेगा क़ुदरत का
अपनो से कब तक मिलना होगा
कब विरह मिटेगा मुद्दत का

डा. राज सिहं


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