आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   aur main lucknow ho jata hun

मेरे अल्फाज़

और मैं लखनऊ हो जाता हूं

Rakesh Dhar

2 कविताएं

208 Views
मैं लखनऊ स्टेशन से बाहर निकलता हूं
सामने लिखा हुआ है कि 'मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं'
भूल-भूलैया और इमामबाड़े से
गुज़रता हुआ रेजीडेन्सी होकर मैं हजरतगंज पहुंच जाता हूं
अम्बेडकर पार्क, लोहिया पार्क और शहीद पथ देखकर
मन ही मन मुस्कुराता हूं, चारों तरफ़ हरियाली है, दिव्यता है
मकराने के लाल पत्थरों से मुस्कुराती भव्यता है

सजी हुई पार्क में बेजुबान मूर्तियां,
जो दूर से आए अनेक लोगों को लुभाती है
लखनऊ के नए वैभव से परिचित कराती है
मैं बार-बार गौरवान्वित महसूस करता हूं
अपने लखनऊयेपन पर याद करता हूं कि विवश होकर
कैसे मैं नोएडा, गाजियाबाद चला जाता हूं
और लखनऊ की यादों में किसी बहुमंज़िली इमारत की
तेरहवीं मंज़िल के आठ बाय आठ कमरे में बैठा
गोता लगाता हूं, सोचता हूं यदि होते इन भव्य स्मारकों के स्थान पर
कुछ कारखाने, कुछ धुआं उड़ाती चिमनियां
जिनसे सुबह शाम निकलती उम्मीद और हौसले से भरी ज़िम्मेदारियां
तो मैं क्यों लखनऊ छोड़ इस कंक्रीट के जंगल में आता
अमीनाबाद की प्रकाश कुल्फ़ी से निकलता
और हजरतगंज में वाजपाई की पूड़ियां खाता और
यादों की इस गठरी को बांधे-बांधे
मैं हजरतगंज के लवलेन में कहीं खो जाता हूं 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Disclaimer


हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।
Agree
Your Story has been saved!