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मेरे अल्फाज़

इस दुनिया से जीतकर भी

SHANKAR lal

94 कविताएं

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इस दुनिया से जीत कर भी
आजकल दूसरे की दीवार पर
हर कोई कान रखता है
अब मकान में अपने ना कोई रोशनदान रखता है

खुद के आंगन में नफरत की चिंगारी सुलगती रहती है
दूसरों के आंगन में प्यार की बुनियाद रखता है
जब चाहा बेअदब बेजुबान भरी महफिल में बोल दिया
बेलगाम जुबान पर शराफत की लगाम कौन रखता है

चाहत की रंगीन दुनिया में परेशां हो चुका है हर शख़्स
हसरतों का हिसाब फिर बेहिसाब क्यों रखता है

मायूस दिलों को मोहब्बत की आवाज सुनाई आयेगी कैसे
यहां जर्रे जर्रे में मुदत्त से पत्थरों का इंसान बसता है

अब नहीं रही सपनों की दुनिया जहां जीने को दिल चाहे
इस दुनिया से जीत कर भी हार जाने को जी करता हैै

शंकर बुलंदशहरी

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