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मेरे अल्फाज़

सहेली याद आयेगी

shubha pachpor

28 कविताएं

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सहेली याद आयेगी
मंदिर की दीवारें ख़ामोशी बुन रही हैं
घण्टे की गूंज मंद पड़ रही है
हवा भी चुप-चुप सी गुजर रही है
हंसी भी किस बियावान में खो रही है
संध्या भी दुःख का इज़हार कर रही है
सहेली हम से दूर जा रही है
छुई मुई सी शरमाती
जूही सी महकती
आंखों से अनकहे राज सुनाती
झरनों से झरती बातें करती
बंद आंखों से रौशनी भरती
सदा मुस्कुराती
सदा मुस्कुराती ख़्वाबों में आयेगी
सहेली याद आयेगी
सहेली याद आयेगी


-- शुभा पाचपोर


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